Friday, October 2, 2015

महबूब मेरे

इतना तो कर ही दूंगा तुम्हारे लिए..
के जब भी याद आओ एक शायरी सी लिख दूँ।
जब दिल को रुला जाओ, एक आशिकी सी कर लूँ।
एक उम्र मुनासिब है, तुम बिन यूँ ही जीने को..
थोड़ा सा मैं मर जाऊं, तुम याद जो आ जाओ।
हर जख्म का बेबस एक ताल्लुक है रहा मुझसे।
मैं हंस के ये सह जाऊं, तुम याद जो आ जाओ।
ता'उम्र मोहब्बत का वादा न कोई देना..
ये इश्क है मुफलिस सा.. तुमको भी बना देगा।
बस प्यार थोड़ा देना, तुम याद जो आ जाओ।
वादा है मेरे दिलबर, इस हर्फ से आशिक का..
एक इश्क तबाही के, हमजर्फ़ से आशिक का।
तुम आँख इधर फेरो, ये दर्द मेरा जाए।
तुम हंस के मेरी जानम बस देख तो लो मुझको।
ये मौज अता करने, जन्नत भी चला जाऊं..
वादा तो करो तुम के, कब लौट के आओगी..
मैं अपनी मोहब्बत में, तब मौत को ठुकराऊं <3