कोई इंसान कभी भी अपने समाज के अंदर के सो कॉल्ड डेविल का दर्द नहीं जान पाता,
क्योंकि कहानी भगवान लिखता है।
वो दर्द जनता को जानने ही नहीं दिया जाता जिसकी वजह से बना है वो क्रूर, हठी, तानाशाह, निर्दयी
जो कोसता रहता है उसे अंदर ही अंदर
कभी उसके पीछे कोई पारिवारिक समस्या रहती है
जो सिर्फ इस वजह से आप तक नहीं आती
क्योंकि आप जैसे बहुत से लोगों को सिर्फ "इट्स ओके यार, सबके साथ होता है" कहने की आदत है
कोई समझना नहीं चाहता की हर समंदर की अलग गहराई है और आप सबको एक ही मापक से नहीं माप सकते
आप समझने की कोशिश ही न करेंगे इसीलिए वो लील जाता है उन तमाम सामाजिक प्रताणनाओं को,
उसके जीवन का गरल समाज में कैंसर बन जाता है
और फिर शुरू होती है उन सबकी अनभिज्ञता की दास्तां
जिन्होंने उसको दादू से दावूद तक के सफर की मम्मी सिस्टर की है
और अंत तक कोई ये नहीं समझ पाता की वही शैतान जिसने नाटक लिखा है,
रंगमंच पर हर पात्र को गरिया रहा है।
कभी उसके पीछे होता है कोई अधूरा सपना, कुछ अधूरी ख्वाहिशें, कुछ टूटे रिश्ते, कुछ छूटे अपने
और ये बात भी कुछ अलग नहीं है ऐसा तोह सबके साथ होता है!
अरे! सबके साथ होता है और सब चुपचाप मरवाते रहते हैं इसका मतलब ये तो नहीं की वो भी मरवाए!
वो रखता है हिम्मत तमाम ओड्स में से एक इवन बनने की
तमाम रोड़ो में से आगे निकलने की
आप लोग क्यों सपोर्ट नहीं कर सकते यार?
क्योंकि "टाइम टू एक्ट" वाला शॉर्टकट समझ नहीं आता,
सबको लगता है कि "वक़्त सारे घाव भर देगा"
घंटा भर देगा ,
वक़्त से खुद जाके पूछा है कभी कितने घाव लिए फिरता है?
वो मम्मी के हाथ का कढ़ी भात, जिसके लिए सालों से जीभ लपलपा रही है, वक़्त ला के देगा?
वक़्त वो वक़्त लौटा देगा जो गुजारी है उसने बिना पुस्तकों के सिलेबस तैयार करते हुए!
वक़्त वो ठंडी की रातें लौटाने आएगा जिनमें पुरे कोड़े पहनने के बाद भी इतना दम नहीं रहता था कि शरीर की थरथराहट काम हो सके!
वक़्त वो एक समोसे और ढेर सारी चटनी के सहारे गुजारा गया दौर फिर से सही करने का मौका देगा!
अगर हर बार मन "नहीं" कह के रुक जा रहा है तो प्लीज अब आगे से किसी से मत बोलना की टाइम सब ठीक कर देता है,
टाइम सब ठीक करने की औकात ही नहीं रखता,
अगर उसके पास कुछ है तो इतना के आपको realize करा सकता है कि क्या करना है,
कब करना है ,
और कैसे करना है।
वो खुद को दूसरा घाव देने से बचने के लिए ऐसा हो गया है।
न की ऐसा था, ऐसा ही था, और ऐसा ही रहेगा।
क्योंकि उसे पता है
There's a light in the other side of the door,
So he does what is right, instead of doing what is easy.
He knows "after all patience, there's a way to get what you want"
Saturday, November 26, 2016
पंथ कुछ और काज।
छत
छतें देखती हैं, अपने कोनों किनारों से
कुछ उचककर कभी उछलकर
सुना है जब से घरों में मंज़िलें बढ़ी
छतें छोटी हो गई.
साथ ही छोटे हो गए वो सपने
जो छत पर पला करते थे
यहीं खेल खेलते वक़्त हम
घुटनों के बल चला करते थे
गर्म रातों को जुगनू देखने की आरज़ू में
हम बिजली गुल होने की दुआ करते थे
यहीं नानी की कहानियों के
हम शहजादे हुआ करते थे.
यहीं नजर के मिलने हटने और फिर मिलके
एक मुस्कुराहट में बदलने में जवां प्यार पनपते थे
आशिक किताबों में छिपाकर अपनी शक्ल
दिन रात माशूका का नाम जपते थे
वक़्त लगता था गीले कपड़ों को तारों में लटकने में
लूटते थे दिल हसीं चेहरे भीगी जुल्फ झटकने में
जहां चांद हर रात डाकिया बनकर खत पहुंचाता था
होता था दिन पूरा जब महबूब नजर आता था
वो छत मुझे अब वीरान नजरों से देखती है
कुछ बरस हुए मुंह से लहू फेंकती है
उग आए है उसपे कुछ बबूल कांटे
सांसे उसकी अब चलते हुए फूलने लगती है
मैं सोचता हूं जो किसी रोज एक पतंग
जिसपे लिखी हो एक मोहब्बत की गजल
कहीं से कट कर गिर आए छत पर
और छत की नब्ज जुड़ जाए
सांस फिर से चलने लगे और
प्यार फिर से पलने लगे.
"आशिक़"
Tuesday, November 22, 2016
गीतांजलि
मुझे खाना बनाना आता है, सिर्फ इसलिए कोई मुझे पसंद कर ले ?
तमीज़ और सलीका दोनों है ,सिर्फ इसलिए कोई मुझे पसंद कर ले ?
मैं दिखने में अच्छी हूँ, सिर्फ़ इसलिए मुझे कोई पसंद कर ले ?
अच्छा कमा लेती हूँ,सिर्फ़ इसलिए मुझे कोई पसंद कर ले ?
अच्छा करियर है,सिर्फ़ इसलिए मुझे कोई पसंद कर ले ?
सो कॉल्ड चरित्रवान् हूँ, सिर्फ़ इसलिए मुझे कोई पसंद कर ले ?
घर बाहर संभाल सकती हूँ,सिर्फ़ इसलिए मुझे कोई पसंद कर ले ?
सक्षम हूँ, साहसी हूँ,सिर्फ़ इसलिए मुझे कोई पसंद कर ले ?
और अगर इनमे से कुछ भी नहीं हूँ,तो सिर्फ इसलिए नापंसद कर दे ?
माफ़ कीजियेगा, मेरे जीवन की कसौटियां इतनी ओछी नहीं हैं।
इन अर्थहीन, मूल्यहीन बातों से मैं खुद को नहीं तौल सकती।
किसी के साथ जीवन बिताने की जो शर्तें समाज में हैं, उनसे मेरी ज़िन्दगी नहीं चल सकती।
शर्त सिर्फ एक - अगर कोई दिल को छू गया तो वो जो हो जैसा हो सब मंज़ूर है।फिर सारी दुनियादारी गई तेल लेने।
Monday, November 21, 2016
नेह नित नया
ऐसे लगा है आँख में काजल
लगे कि धूप को ढक ढक रहा कोई
शलमला बादल
कि ऐसे आँख में डूबी हुई है
सारी मदहोशी
के जैसे बांटती फिरती हवा है सबको बेहोशी
के जैसे सूरमे ने ली कसम के क़त्ल कर देगा
देख लेगा जो भी वो नैनों को शर कर देगा
Wednesday, November 16, 2016
मुमकिन है
तुम अपने सारे वादे , भूल जाओ मुमकिन है
कभी भी मेरी आँखों की तरफ न रुख घुमाओ, मुमकिन है
ये मुमकिन है के शायद तुम कभी न समझ पाओगे हमे
या फिर कभी हमको समझ के , बुद्बुदाओ मुमकिन है
कभी सर्द रातों की टीस में दबी ,
कभी बिछौने की लटकन में सहमी सी यादें
कभी छावन में फैला हुआ मकड़ी का वो जाला
कभी सावन में घिरती बाहों से गर्दन में वो माला
कभी बेबस तकी आँखों के कुछ अनकहे किस्से
कभी सूखा दही पूरी, के वो आधे से दो हिस्से
कभी मुमकिन है तुम समझोगे यादों के मेरी माने( मायने)
कभी मुमकिन है तुमको याद मेरी हर जुबां होगी।,
कभी कोई दिया जल उठेगा यूँ खुद की गर्मी से
कभी खुद भी सहेम जाओगे जब होंठों की नर्मी से
उसी एक वक़्त के पल्लू में सबकुछ मिल जाए मुमकिन है
💜
Wednesday, November 9, 2016
नवम्बर
सर्दियों कि धुंधली सुबह सी तेरी याद
नम करती आँखें कुछ वैसे ही
कंपकंपाते होंठ और थरथराता जिस्म
वैसे ही जैसे,
जाड़े कि सुबहों में तुम भीगे हाथ लगते थे
और हँसते थे मेरे रूठ जाने पर
और सर्द रातों सी ये तेरी याद
सुनसान रातों में किटकिटाते दांतों सी,
खुद ही को देती सुनाई
गर्म साँसों को फूँकती और हथेली को करती गर्म
घिसती और टांगों के बीच छुपाती
ठंडी सी नाक और
खुश्क लब
और उनमे बसी,
जाड़ों जैसी, तेरी याद..
नवम्बर की रात।
और मेरा आमलेट?
वो भी मैं खा गया..
हॉ!! गंदे.. क्यों किया?
तुम मुझे खा लो न..
यह सुन कर मैं मुस्कुरा दी.. "मतलब.. कुछ भी?"
हा हा हा.. नहीं सच कह रहा हूँ, मुझे खा कर देखो, अंडे का टेस्ट आएगा..
दूर हटो! और मैं किचन में चल दी, मुझे मालूम था शनिवार की छुट्टी और सारा दिन ना कबीर को कुछ करना है ना मुझे कुछ करने देना है, सारा दिन यूँ ही बाते बना कर निकाल देंगे और खुद को सुपरमैन समझ कर लास्ट मिनट एन्ट्री करेंगे..
सुनो..
हाँ गुलबदन कहो?
यह गुलबदन क्या होता है अब, क्या क्या बुलाते रहते हो.. कल रात तो मैं गुलाबो थी?
कल रात तुमने लाल लिपस्टिक लगाई थी अभी तुमने कुछ नहीं लगाया, और रात की लाली हलकी सी है तो गुलाब का बचा हुआ "गुल" और तुम्हारा बदन.. यह कह कर कबीर ने फिर मुझपर लपकने की कोशिश की..
मैंने माथा पीट लिया, लेक्सिकल इंटरप्रिटेशन की थीसिस मेरी है और अर्थ का अनर्थ तुम करते हो!!
सीने पर हाथ रख कर पीछे धकेलते हुए मैं बोली "क्या चाहिए?"
"बेटी"
"धत्त!!" कह कर मैं हंस दी..
"अरे सच। तुम्हारे जैसी, मोटे गालो वाली, थोडी पर तिल वाली, मोटे मोटे होंठ.. बत्तख की तरह चलने वाली.. छोटे छोटे हाथ.. देदो ना.." कह कर कबीर ने गले में गुदगुदी कर दी..
हाहाहाहा.. दूर हटो और छोडो मुझे!! दीवाली आ रही है.. भाभी का फ़ोन आया था, घर बुला रही हैं इस बार..
और कबीर ने मुझे छोड़ दिया..
"हैं? छोड़ क्यों दिया?"
"अरे तुमने ही तो कहा 'हटो दूर, छोड़ो मुझे' मेरी आवाज़ बनाते हुए कबीर ने चिढ़ाया..
"च्च!! तो मेरा मतलब वो थोड़ी ना था, लिट्रेलि छोड़ने का.. पकड़ो फिर ठण्ड लग रही है"
" तुम औरतों का भी ना कुछ समझ नहीं आता, कर दो तो दिक्कत, ना करो तो दिक्कत.." कहते हुए कबीर ने बाहों में फिर से भर लिया..
देखो जी, औरतों को ब्रह्मा भी नहीं समझ पाए, तुम तो फिर भी एक मामूली से बैंकर हो..
और इस बैंकर की बैंकरानी तुम!
अब यह बैंकरानी क्या होता है?
पति-पत्नी : बैंकर - बैंकरानी!
बैंकरनी होना चाहिए ना ? मैंने हँसते हुए कहा..
वाह मेरी पीएचडी!! कबीर हंस पड़ा अच्छा तुम कुछ कह रही थी.. ठण्ड लग रही है..?
हाँ!
मैं तुम्हारा अपना पर्सनल हीटर मेरी छिप.. अनारकली!!
क्या??
कुछ नहीं!! वो ठंडी?? और कबीर दांत दिखा के हंसने लगा
हाँ, ठंडी! ऊपर से सूटकेस उतरने हैं, तुम्हारी गर्म टीशर्ट के लिए, मौसम बदल रहा है फिर सर्दी होगी.. जाओ ना.. उतार दो..
तुम हो ना हीटर!! तुम्हे पहन लूँगा!!
मार खाओगे अब.. काम करो कुछ, ऑमलेट भी खा गए, मुंह बनाते हुए मैंने कहा..
तुम हाथ उठाओगी मुझपर? मैं पति परमेश्वर हूँ तुम्हारा, सेवा करो मेरी और एक कप चाय और बनाओ.. समझी औरत??
जाते हो की मैं ही उतारूँ?
जा रहा हूँ बीवी.. और गुनगुनाते हुए कबीर कमरे में चला गया.. "ज़माना तो है नौकर बीवी का.. "
नवम्बर की शाम
ये शामें उकसाती हैं मुझको
तुमको प्यार जताने को
ये रातें याद कराती हैं
मन करता है दुलराने को
क्या कहूँ ये बेकल मन ही है
क्या करूँ मुझे कुछ ग़म ही है
क्या समझ नहीं तुमको प्रियतम
क्या सबसे कंजर हम ही हैं?
क्या कभी नहीं लगता तुमको
क्या कभी न ये एहसास हुआ ,
क्या कभी न तुमको याद आया
क्या कभी न मन यूँ उदास हुआ ,
क्या कभी नहीं इतराया ये दिल
फिर मेरी हो जाने को!
ये रात नवंबर की देखो
आधी जागी आधी सोई
ये आँखें यूँ इन यादों में
किसके स्वप्नों में खोई
क्यों मन में ये भूचाल सा है
क्यों मन ये फ़क़त बेहाल सा है
मानो रस रंजित देह अभृ
में कोई कहीं निहाल सा है
तेरी ही तेरी यादें हैं ,
तेरी ही तेरी बातें हैं
सब यादों में सब बातों में
एक उलझा हुआ सवाल सा है।
क्या तुम्हे नहीं लगता प्रियतम
तुम-मुझमे कहीं समायी हो
क्या तुम्हे नहीं लगता प्रियतम
तुम मेरी ही परछाई हो
हो कभी रंग-रंगित मल्हार
कभि ग़म की एक शहनाई हो
हो कभी कभी भोली भाली,
पर कभी-कभी हरजाई हो!
Sunday, November 6, 2016
अभियंता the रियल engineer
हाँ हम उस कौम से हैं
जिसके शरीर से सिगरेट , शराब , ठरकीपन , निकम्मेपन और न जाने कितनी कितनी चीजों की बदबू आती हुई समझ में आ जाती है ,
Even आप हमें personally न भी जानते हों तो ,
आप ये बड़े विष-वास के साथ कह सकते हो , " ये तो मुंह से ही कंजर लगता है" या फिर " मुझे तो देखते ही लग गया था कि इंजीनियर है "
पर , पर आपकी सहूलियत के लिए बता दूं ये जितनी बकैती करते हो न , और जितने तंज कसते हो हमपे
कभी एक बार इंजीनियरिंग कर ली होती ,
या फिर जून जुलाई या दिसम्बर जनुअरी के टाइम पे अपने किसी स-खा के यहाँ उसके हलाहल पीते हुए तीव्र तात्कालिक उहाफोह में notes को नोट गिनने वाली मशीन जैसे पढ़ते हुए देखते ,
और अगले दिन जब सोकर जागते और वो दोस्त जो पेपर देने गया था, कब सोया! क्या खाया! कैसे गया! कब आएगा! इन सब बातों की तरफ ध्यान न देते हुए वाशरूम में जाते और लौटकर तमाम कमरे में पड़े हुए सिगरेट के butts और 4-6 ( व्यवस्था अनुसार ) गुदी हुई रफ़ कापियां देख कर आपके जेहन में एक ही सवाल कौंधते कौंधते रह जाता ,
लौंडा तो कभी न पढ़ा होगा
और अब उठ के चाय बनाने की सोचते तो ज्ञात होता के दूध तो रात में ही चुक गया था 🤕
वैसे ये बिलकुल भी इंटरेस्टिंग नहीं था ,
क्योंकि ये वास्तविकता थी!
आपका इंटरेस्ट तो इसमें रहता है कि कब किसी न्यूज़ पेपर में पढ़ने मिल जाए की कहाँ के engineers ने क्या किया
वैसे भी लोगों को "behind the scenes" देखने की आदत काम होती है ,
ये दुनिया की एकमात्र ऐसी कौम है जो हर बात में रस लेती है ,
और हर पक्ष के पक्ष में रहती है , आपको लगता है कि लौंडा इंजीनियर है तो उसे मिक्सी से लेकर घड़ियाल तक कुछ भी पकड़ा दो ,
भई बात तो तुम्हारी भी सही है किस्से जो सुन लिए हो इतने
पर एक बात नोट कल्लो लिख लो वो अगर बंद टाला न तोड़ पाए , कंप्यूटर साइंस वाला बंदा टीवी न ठीक कर पाए तो बिलकुल आप गरिया सकते हैं
इसमें आपका दोष नहीं है
आपके लिए तो दोनों चीजें ऐसे हैं जो मूवी देखने के काम आती हैं,
Tragedy ये है कि आपमें एक वहम समा गया है
सबको ये एहसास दिलाने का की अगर वो सर्व गुण संपन्न नहीं है तो वो इंजीनियर हो ही नहीं सकता
अरे भाई प्रॉब्लम तब नहीं आती जब आपको 17 का पहाड़ा नहीं आता प्रॉब्लम तब आती है जब आपको कैलकुलेशन नहीं आता ,and now you know why we're Those who don't term it as "lack of knowledge or whatever you think" coz we know (a+b)×c 😉
और हाँ कंप्यूटर फॉर्मेट करना कोई बड़ा इशू नहीं है इशू है उसके बाद का इंतज़ार
आप ही बताइए कैसा लगता है जब डॉक्टर के यहाँ नंबर लगाने की लाइन में। खड़े होना पड़े और आगे की भीड़ न घाट रही हो!
लगती है न रिस की चिचुआ दें!
सेम वैसे ही हालात होते हैं कोई भी चीज इग्नोर करने के पीछे
बाकी हम में से लगभग लोग शेष दुनिया को BOND लगते हैं
(कुछ को Bakc** Of Nth Degree , और कुछ को जेम्स बांड 😎 )
आप अपने से तय कल्लो
पर एक बात बताना चाहूंगा
हम में भी एक आत्मा है,
एक समय हम भी सीरियस रहते हैं बस ये जो उलटफेर हमारे और आपके भावों के बीच का है ये उस कारागार की वजह से है जो हमने किसी institute रूपी काले पानी में बिताए हैं,
उस चाणक्य का है जिसने हमें अपने आप से खरीद लिया था ,
उस कौम का है जिसके लिए हर दिन होली और हर रात दीवाली होती है (होली दीवाली छोड़ के, उस समय परीक्षा रहती है न 🤐 )
उस सूद का है जो हर सेमेस्टर के साथ पिछला बकाया जैसे आता रहता है ,
और उस प्रेम कहानी का है जो किसी busstop पे स्टार्ट हुई और किसी Roadside ढाबे पे ख़तम हो गयी,
उस दोस्ती का है जो फूटी आँख न सुहाने से लेकर आँख का तारे होने तक है ,
उस कॉन्फिडेंस का है जो हमे 4 साल मशीन स्क्रू पढ़ने के बाद भी , ख़ुशी ख़ुशी व्यंग्य लिखने में रस-रत रखता है
और उस हौसले का है जिसकी वजह से आपकी सारी शान-ओ-सौकत है।
हम भी माँ-बाप और बड़ों की इज्जत करना जानते हैं , बस आपका operating system पहले ही फॉर्मेट एरर बता देता है,
हमारे प्लान में आकर देखो ,
हर सेक्शन और एलिवेशन समझ में आ जायेगा 😘
Saturday, November 5, 2016
मौत सामने है
मौत सामने है ,
क्या खूब नज़ारा है!
इन खुश्क से होंठों में ,
एक नाम तुम्हारा है
एक आस तुम्हारी है,
एक प्यास तुम्हारी है
तुम्हे एक नज़र देखूं
अरमान खुदारा है ,
यह पीर का मंजर है,
या रूह ही पीर सी है,
या पीर को मेरी कुछ
तेरा भी इशारा है
न दर्द हुआ ऐसा
ना ज़ख्म मिले ऐसे
यह शज़र था शजरे में
पर ना ये हुआ मुमकिन
हम भूल सकें तुमको
तुम्हे दिल ने बसाया है
साँसों ने संवारा है
मेरे सांवरे सामने हैं
क्या खूब नज़ारा है 💜
Thursday, November 3, 2016
For My Sweet Princess
Ain't after him ,
But after the happiness of you,
After the acts he does for making you smile,
After the smile you wear being with him,
They're after stealing him
Thinking he'd do the same
For them
As he does for you,
But the Poor's illness!
They didn't know if Lilly only blooms for the moon
Not for the stars,
They all want a better person
Instead of being the one,
They didn't know what you have paid to be what You are today,
They don't know the pain you've been through,
They are just jealous of your Persona,
The realm in your yese,
The beauty of your thoughts,
The purity of your heart
The aroma of your purity is what making them jealous,
Let them be,
Be like this,
Be a hero
#ForTheOne