Friday, February 15, 2019

एक जवान के साथ सामान्य दिन

SumitBhiya:
एक जवान के साथ सामान्य दिन
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साल 2011 मैं दिल्ली में डीआरडीओ की एक लैब 'इनमास' में अपना प्रोजेक्ट वर्क पूरा कर रहा था। गाँधी विहार में रूम लेकर हम तीन दोस्त रहा करते थे। घर से आये पैसों को खर्च करने में कोई एहतियात नही था, तो आदतानुसार महीने का अंतिम पखवाड़ा गरीबी में गुजरता था। हाथ तंग हो जाता था, तो खाना बनाने का सामान भी दिहाड़ी व्यवस्था में खरीदा जाता था। अंतिम दस दिन इंस्टीटूट भी पैदल चले जाते थे, जिससे दाना पानी चलता रहे। घर की गालियों के मुकाबले ये ज्यादा आरामदायक था। कॉलेज के अंतिम दिनों में जब भविष्य की कोई निश्चित योजना और व्यवस्था न हो उस समय घर के माहौल को बिगाड़ना कोई समझदारी बिलकुल नही थी तो अतिरिक्त पैसों के बारे में सोचना एक आत्मघाती निर्णय था।

ठंड का मौसम था। तीन लोगों में दो रजाइयां थी। ऐसे में किसी मेहमान या दोस्त का आना हम बिल्कुल भी अफ़्फोर्ड नही कर सकते थे। जेब में पैसे न हों तो आपस की लड़ाइयाँ भी आक्रामक हो जाती हैं। एक शाम एक दोस्त नाराज होकर अपने किसी और दोस्त के साथ उसके रूम पर चला गया। बाकी बचे हम दो किसी बात पर एक दूसरे को गालियाँ देते हुए इंस्टिट्यूट से लौट रहे थे तो दोस्त के पास उसके मामा का फोन आया कि वो दिल्ली आ रहे हैं। श्रीनगर से दिल्ली आकर उनको एक ट्रैन पकड़ कर घर जाना था लेकिन ट्रैन लेट हो जाने के कारण उनकी अगली ट्रैन बिना उनका इंतजार किये निकल गयी। इसलिए उनको एक दिन दिल्ली में गुजारना पड़ेगा। ये खबर हमारे खेमे में किसी हैंडग्रेनेड की तरह आकर गिरी। जेब में बहुत थोड़े पैसे थे। खाना बनाने का सामान खरीदा गया। रूम पहुंच कर तैयारी करने लगे। ट्रेन को रात ग्यारह बजे नईदिल्ली के स्टेशन पर पहुँचना था।  खाना बन चुका था, भूख तेज लगी थी तो हम दोनों ने अपने हिस्से की रोटियां खाई और मामा जी के लिए भोजन ढक कर उन्हें लेने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिए।

जीटीबी नगर से मेट्रो लेकर हम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के मेट्रो पर पहुंचे। बाहर निकल कर दोस्त ने मामा जी को कॉल किया। कॉल कनेक्ट नही हो पा रहा था। हम बाहर  चाय पीने निकल गए। स्टेशन लौटने पर पता चला ट्रैन दो घंटे और लेट हो चुकी थी। दोस्त ने बताया मामा जी सीआरपीएफ में नौकरी करते हैं और श्रीनगर में पोस्टिंग है। छुट्टियों में घर जा रहे हैं। करियर की चिंताओं और इन्स्टिट्यूट की लड़कियों के बारे में बात करते करते तकरीबन एक बजे थे की ट्रैन आने की घोषणा हुई। थर्ड ऐसी के डिब्बे से छह फुट तीन इंच का भारी भरकम शरीर निकलते देख मैं पहचान गया कि यही वो प्राणी है जिसने हमारी जमी जमाई दिनचर्या को उथल पुथल करने का बीड़ा उठाया है।

दोस्त ने परिचय कराया, उन्होंने अपने दोनों हाथों से मेरे दोनों बाजुओं में धौल जमा दी। मैं इस अप्रत्याशित हमले से अंदर ही अंदर चरमरा गया, लेकिन उस समय मुझे यकीन हो गया कि देश की सुरक्षा बहुत मजबूत हाथों में है। दो भारीभरकम बैग थे, जो उन्होंने हम दोनों को पकड़ा दिए और खुद उन्होंने गत्ते के एक कार्टन को अपने दोनों हाथों में उठा लिया। अब हमारी टुकड़ी का नेतृत्व मेरे हाथ से फिसल कर उनके हाथ में चला गया था। बाहर निकलते ही वो एक ऑटो में बैठ गए। बैग को ऑटो के पीछे रखा और कार्टन को एहतियात से रखने की समझाइश देते हुए ऑटो वाले को एक प्यार भरी गाली दी। उसके बाद उन्होंने मुझसे पूँछा की कहाँ चलना है। मैंने ऑटो वाले को गाँधी विहार चलने को कहा। उन्होंने बीच में खाने के बारे में पूँछा हमने उन्हें बताया कि रूम पर भोजन की व्यवस्था है। उन्होंने फिर भी कहा कुछ ले लेते हैं, लेकिन हम लोगों ने मना कर दिया। करीब आधे घंटे में हम जीटीबी नगर होते हुए गाँधी विहार अपने रूम पर पहुंचे।

रूम पर पहुंचते ही हमारे फाख़्ते उड़ गए। दरवाजा भीतर से बन्द था। खटखटाने पर दूसरे दोस्त ने दरवाजा खोला। मैं सीधा किचन की तरफ भागा, वहां गंदे बर्तनों के अलावा कुछ नही था। दोस्त वापस लौट कर बचा हुआ खाना खा चुका था। रात के दो बजे अब क्या होता। किचन में एक आलू एक बैगन और एक प्याज बची थी, आटा पर्याप्त था। मैं बाहर निकला तो मामा जी कार्टन खोल रहे थे। कार्टन में बारह रम की बोतलें मुंडी उचका कर झांक रही थी। मामा जी ने एक बोतल को उसकी गर्दन पकड़ कर बाहर खींच लिया और बगल में रखी तीन स्टील की गिलासों को भर दिया। एक गिलास उठा कर खत्म करते हुए किचन की ओर दौड़ लगा दी। सामने रखी प्याज को मुक्के से कचूमर बना दिया और प्लेट में नमक निकाल कर बैठ गए। बाकी की दोनों गिलास अनछुई रखी थी। गालियाँ देते हुए उन्होंने गिलास उठाने को कहा और कहा दवाई है ऊपर से नीचे तक पी जाओ। एक तो लाल चमकती रम, ऊपर से स्टील की गिलास, पानी की मात्रा शून्य और खाने के नाम पर केवल प्याज और नमक। नेतृत्व हमारे हाथ से निकल चुका था। भगवान ऐसे हालात किसी को न दे। गले की नली से लेकर पेट की दीवारें तक की सिंकाई हो गयी थी।
SumitBhiya:
दोस्त को मैंने खाने के हालात के बारे में बताया, वो खाना बनाने के बहाने किचन की तरफ निकल गया। मैं उनसे उनकी नौकरी के बारे में पूंछने लगा। वो बताने लगे, वहाँ हालात कभी कभी बहुत खराब हो जाते हैं। बर्फ गिरती है, तेज बारिश होती है पर पैट्रोलिंग उस समय भी नही रुकती। एक हाथ में बंदूक और दूसरे हाथ में पानी का डिब्बा लिए निवृत होते हुए भी चौकन्ना रहना पड़ता है। उन्होंने कई खतरनाक इलाकों के बारे में भी बताया। कई घटनाएं बताई जहाँ वो खतरे में फँस गए थे। उन्होंने कहा कि सीमा से ज्यादा खतरनाक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की पोस्टिंग होती है। यहाँ कभी भी कुछ भी हो सकता है। यहाँ हमेशा ही युद्ध के हालात बने रहते हैं। बात करते वक़्त कभी कभी वो अपनी मुट्ठियों को भींच कर हवा में लहरा देते थे। मैंने उनसे पूँछा कि आपको  पसंद है ये नौकरी, तब उन्होंने कहा हम लोग अब ये सब नही सोचते। अपना काम है, सोच कर करते हैं। अब आदत में आ चुका है ये सब। खतरे झेलना, चौकन्ने रहना, जरूरी नियमों का पालन करना। अब अच्छा ही लगने लगा है वहाँ । उन्होंने किसी भारी भरकम शब्दों का उपयोग नही किया, लेकिन उनके बात करने का तरीका बता रहा था कि उन्हें अपने काम पर गर्व है। उन्होंने अपने काम में किसी तरह का एहसान नही जताया, लेकिन एक आत्मगर्व जरूर था, जो प्रवाहित होते हुए मेरे शरीर में सनसनी फैला चुका था।

खाना तैयार हो चुका था। दोस्त ने कुछ रोटियाँ और बैगन आलू की सब्जी बना दी थी। मैंने मामा जी से अपनी आधी अधूरी व्यवस्थाओं के लिए खेद व्यक्त किया। उन्होंने कहा बन्द कमरे में बैठ कर इत्मीनान की रोटी कितने दिन बाद खाई है। उन्होंने कहा सीमा पर जवान और दूसरे शहर में स्टूडेंट की हालत एक ही जैसी है। खाने के बाद हम सब ने बिस्तर पकड़ लिया, दोनों रजाइयों को जोड़ लिया गया। मामा जी किनारे पर थे। उन्होंने घर फोन लगा लिया था। फोन पर पहले तो वो शायद घर लेट पहुंचने का कारण समझा रहे थे। कुछ देर में वो घर की सारी खटिया तोड़ डालने की बात करने लगे। मैं और मेरा दोस्त अपना मुंह दबा कर रजाई के भीतर हँसते रहे। वो हम लोग को सोया हुआ समझ कर स्वच्छंद महसूस करने लगे। मैं और मेरा दोस्त मनोरंजन की उच्चत्तम अवस्था में थे। हँसी थी की रुक नही रही थी लेकिन हम किसी तरह की हरकत करके इस क्रम में कोई विघ्न नही डालना चाहते थे। बातें ऐसी हो रही थी जैसे कोई कॉलेज का लड़का अपनी प्रेमिका से पहली बार अकेले में मिलने की योजना बना रहा हो। हम जानते थे ये क्रम लंबा चलने वाला है, पर दवाई का असर गहरा था। कब गहरी नींद आ गयी पता ही नही चला।

सुबह नींद खुली, रजाई से सिर बाहर निकाला तो नजर सीधे रम की बोतल पर पड़ी जिसे अभी पंद्रह मिनट पहले ही खोला गया था। ऐसे सुबह सुबह कौन पीता है भाई। पर मामा जी पपीता छील कर उसके टुकड़े कर रहे थे। फलों से भरी थैली बगल में लुढ़की थी। नमकीन का पैकेट खुल कर आज ही के ताजे अखबार के ऊपर फैल चुका था। मेरा सिर पचास किलों का लग रहा था, पेट में जलन हो रही थी। लेकिन रजाई से बाहर निकलना यानि अपने आपको बाहर तैयार वातावरण के सुपुर्द कर आत्मसमर्पण कर देना था। मुझे जल्दी उठकर कम से कम दो ग्लास पानी पीना था, ताकि पेट की गर्मी थोड़ी शांत हो।

उन्होंने रजाई से झांकते देखा तो रजाई खींचते हुए बोले ''जवान! उठो विदा की बेला आ गई है"  उसके बाद उन्होंने कहा जाओ फ्रेश होकर आओ खाना तैयार है। वो किचन की तरफ बढ़ गए। मैं वापस लौटा तो वहाँ थालियाँ सज चुकी थी। उन्होंने सुबह उठकर सामान लाकर खुद ही खाना तैयार कर लिया था। हम सब खाना खाकर स्टेशन की तरफ चल दिए।

ट्रेन स्टेशन छोड़ रही थी। मामा जी घर जा रहे थे। लेकिन उनके चेहरे में हमें छोड़ने की तकलीफ भी दिखाई दे रही थी। जिसमें जरा भी बनावटीपन नही था। सैनिक जहाँ भी होते हैं पूरी तरह वहीं के हो जाते हैं, ये बात शायद इनसे बेहतर कोई नही कर सकता। शायद उनके लिए कालखण्ड केवल वर्तमान से लेकर कुछ ही क्षण आगे तक चलता है। हर समय उत्सवधर्मिता निभाते हुए, जीवन के सम्पूर्ण आनंद को निचोड़ लेना उनसे बेहतर कौन सिखा सकता है। इसलिए मृत्यु को भी उत्सव की तरह स्वीकार लेना उनके अलावा किसी को नही आता। ऐसी कठिन परिस्थितियों के बीच जीते रहना, खुद को बचाये रखना, अंदर के मनुष्य को बचाये रखना, उत्सव को बचाये रखना, तमाम जिम्मेवारियों को समेट कर चलना वैरागियों के लिए भी मुश्किल है।

वापस कमरे में लौटते हुए हम उनकी रात की फोन पर उनकी बातों के बारे में बात कर आनंद ले रहे थे। लेकिन जेहन में एक पूरे के पूरे हिस्से में उनका व्यक्तित्व घर कर चुका था। दो साल बाद जब मैं टेकनपुर ग्वालियर में कंबाइंड आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स की परीक्षा के अंतिम चरण से बाहर हुआ, तो रास्ते भर मैं खुद को पराजित महसूस करता रहा। खुद के अस्तित्व को एक बेहतर दिशा देने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर मैं खो चुका था।

मामा जी से मिलने का अवसर दोबारा नही मिला, लेकिन कल के कायरतापूर्ण हमले में शहीद हुए जवानों के बारे में पता चला तो लगा एक एक जवान के साथ मेरा कोई गहरा रिश्ता है। जैसे हर एक जवान मेरा बहुत सा हिस्सा अपने साथ लेकर देश के लिए कुर्बान हो गया। मुझे कभी नही लगा था, मैं ये घटना भी लिखूँगा लेकिन मैं अपने देश की सीमा और सुरक्षा के लिए तैनात सभी जवानों के प्रति और अधिक संवेदनशील हो गया हूँ। हमें ये सोचना होगा कि महज आंकड़े इस तरह की घटनाओं में हुई मौतों के साथ न्याय नही कर सकते। एक एक जवान अपने साथ पूरी की पूरी जिंदगी लेकर चल रहा होता जिनके साथ कई लोग जुड़े होते हैं। भगवान करे इन जवानों को इनकी जिंदगी में अनेकों ऐसे सामान्य दिन मिलें जब ये दोस्ती कर सकें, प्रेम कर सकें, मुस्कुरा सकें, और कल के सपने देख सकें। हम सबकी ये जिम्मेदारी भी कि जब भी मौका मिले हम इन्हें इतने सम्मान  के साथ नवाज़ें कि इनका आत्मगौरव इनके कठिन क्षणों में भी इन्हें सम्बल दे सके।

जय हिन्द जय भारत
अमर रहे हमारा देश और हमारी सेना

सुमित गौतम

Monday, September 11, 2017

Ghar wapasi

ये नहीं ठीक रास्ता मेरा,
वो नहीं ठीक मंजिल मेरी
ये नहीं सही मेरी खातिर
वो सही नहीं सब जग जाहिर
क्या हुआ, हुआ जो गलत सही
मैं , मैं ही हूँ सरकार नही
क्या हुआ कभी न फलित  हुआ
मैं अभिलाषा से छलित हुआ
सब रिश्ते नाते तोड़ ताड़
सब सुख सुविधाएं छोड़ छाड़
मुझको उसमें मिल जाना है
कल लौट के घर को जाना है।

Sunday, August 27, 2017

First meet abroad

बमुश्किल रोक पाया था
मैं आंसू के उन दो कतरों को
गाल तक आते आते,
दो बातें ही बोली थी
मैंने धीरे से तुमसे
एक कि अब बस जाता हूँ मैं,
एक यहीं तुम रोक लो खुद को
रुंधा हुआ था गला तुम्हारा
और झुकी हुई थी गर्दन भी,
थके हुए थे हम दोनो
और थका हुआ था मौसम भी
एक कसक बस कसक रही थी
क्यों न मौसम से पहले
ये बारिश रुक रुक जाती और हम भीग न जाते आंसू से,
क्यूँ वक़्त सख्त था इतना कि वो रुका नहीं बस एक पल को
क्यूँ संग साथ न ले जा सके हम
अपनी आँखों के जल को
क्यूँ रुकी रहीं तुम मुझे ताकती,
कैब को एक्स्ट्रा भाड़ा देकर,
थमी रह गयी साँसें ये क्यों
उतरा चित्र तुम्हारा लेकर,
क्यूँ उहाफोह में फंसा हुआ मैं
तुमको बेबस छोड़ रहा हूँ
क्यूँ सकुचाती इन आँखों से
अश्क़ की लड़ियाँ तोड़ रहा हूँ..?

Monday, August 14, 2017

Princess


I cant promise u that the dark clouds will never hover over our lives or that the future will bring us many rainbows.
I cant promise u that tomorrow will be perfect or that life will be easy.I can promise u my everlasting devotion, my loyalty, my respect, and my unconditional love for a lifetime.
I can promise u that i'll always be here for u,
to listen and hold ur hand,
and i'll always do my best to make u happy and make u feel loved.
I can promise u that i'll see u through any crisis,
and pray with u,
dream with u,
build with u,
and always cheer u on and encourage u.
I can promise u that i'll willingly be ur protector,
ur advisor,
ur counselor,
ur friend,
ur family,
ur everything.
I love u so so much...

Thursday, July 6, 2017

The Mother Beyond death?

In a mother’s womb were two babies. One asked the other: “Do you believe in life after delivery?”The other replied, “Why, of course. There has to be something after delivery. Maybe we are here to prepare ourselves for what we will be later.”

“Nonsense” said the first. “There is no life after delivery. What kind of life would that be?”

The second said, “I don’t know, but there will be more light than here. Maybe we will walk with our legs and eat from our mouths. Maybe we will have other senses that we can’t understand now.”

The first replied, “That is absurd. Walking is impossible. And eating with our mouths? Ridiculous! The umbilical cord supplies nutrition and everything we need. But the umbilical cord is so short. Life after delivery is to be logically excluded.”

The second insisted, “Well I think there is something and maybe it’s different than it is here. Maybe we won’t need this physical cord anymore.”

The first replied, “Nonsense. And moreover if there is life, then why has no one has ever come back from there? Delivery is the end of life, and in the after-delivery there is nothing but darkness and silence and oblivion. It takes us nowhere.”

“Well, I don’t know,” said the second, “but certainly we will meet Mother and she will take care of us.”

The first replied “Mother? You actually believe in Mother? That’s laughable. If Mother exists then where is She now?”

The second said, “She is all around us. We are surrounded by her. We are of Her. It is in Her that we live. Without Her this world would not and could not exist.”

Said the first: “Well I don’t see Her, so it is only logical that She doesn’t exist.”

To which the second replied, “Sometimes, when you’re in silence and you focus and you really listen, you can perceive Her presence, and you can hear Her loving voice, calling down from above.”

Skeptics will understand someday there is a spiritual world beyond this material world where we live in.

Friday, March 31, 2017

डिअर प्लेसेंटा

माय डियर प्लेसेंटा,

तुम सोच रही होगी कि पापा ने ये कैसा नाम रखा मेरा। पर क्या करूं, जब से तुमने मम्मी के पेट में उलछ कूद शुरू की, तब से एक ही तो शब्द सुना मैंने- प्लेसेंटा। डॉक्टर बोली कि प्लेसेंटा खिसक गया है, नर्स बोली प्लेसेंटा नीचे आ गया। प्लेसेंटा को ये हो गया, प्लेसेंटा को वो हो गया। तब ही सोच लिया था कि जब तुम आओगी तुम्हें प्लेसेंटा कहकर ही पुकारूंगा।सोचा यह भी था कि तुम्हारे आने पर सिर्फ तुम ऊआं... ऊआं... करके रो रही होगीे और हम खुशी से फूले नहीं समाएंगे। लेकिन तुमने तो उलटी कहानी रच दी। तुम आने के बाद चुप रही और हमारी अांखों में आंसू थे।
मेरी हथेली से कुछ ही बड़ी थीं तुम, लेकिन पूरे जिस्म को हिला गयीं।

तुमने जमीन नहीं छुई। मां के पेट से सीधे ओटी की ट्रे में और फिर मेरे हाथों में थे। कुदरत का खेल तो देखो पाँच महीने में तुम पूरी हो चुकी थीं। भले ही बाकी लोगों ने तुम्हें सिर्फ देखा, लेकिन मैंने तुम्हें पढ़ा था। लग रहा था जैसे कहोगीे लो पापा मैं आ गयी। तुम्हारा बड़ा सा माथा, पतली अंगुलियां, लंबे पैर। कहीं-कहीं तुम्हारी स्कीन भी बन रही थी। वो छुटुक सा चेहरा भी देखा मैंने। मेरे जैसी ही दिखी।

तुम वक्त से काफी पहले आ गयीं, फिर भी ओटी के बाहर भीड़ लगी थी। सोचो अगर वक्त पर आती तो क्या आलम होता।

मालूम है तुम्हारी इस जल्दबाजी में मम्मी ने तो सुधबुध खो दी। नानी, मौसी, ताई जी पूरे वक्त रोती रहीं। पापा जैसे स्ट्रांग मैन को भी गुमसुम देखा मैंने। अपने जिन दोस्तों को बताया वह भी उदास थे। आधा बालिस जान दो परिवारों को रुला गई।

कुछ वक्त पहले तुम्हारी हार्ट बीट भी सुनी थी मैंने। एक नहीं तीन बार। जब डॉक्टर बोलता था कि बच्चे की सांसें नॉर्मल हैं तो एक्साइटमेंट में मेरी सांसें तेज चलने लगती थीं। कभी-कभी रात में भी तुम्हारी उथल पुथल का अहसास होता था।

तुम्हारी सलामती के लिए दवा और दुआ करने में कोई कसर नहीं रखी। न एक वक्त की टेबलेट, इंजेक्शन मिस किया और न दुआ। तुम्हें हाथ लगा-लगाकर तुम्हारी मां तुम्हें प्यार करती थी, मोबाइल पर आरती और गाने सुनाये जाते। फिर भी...तुम चली गयी।

तुम्हारे नखरे भी कुछ कम नहीं उठाए। जब से तुम आयीं तुम्हारी मां ने जो बोला वह किया। उसका बोला हर लफ्ज उसका नहीं तुम्हारा होता था। तुम उसे इशारा करती थी कि पापा से आज रसमलाई मंगवाओ। आज मुझे आइसक्रीम खानी है, आज मुझे पनीर चाहिए। जब मैंने तुम्हारा हरेक कहना माना तो तुम क्यों रूठ गयी जल्दी।

जिन पंडित जी को तुम्हारे आने की खुशी में पूजा करानी थी, कल उनसे ही पूछना पड़ा कि अब तुम्हें कैसे विदा करूं। एक सफेद कपड़े में लपेटकर नर्स ने तुम्हें मेरे हाथों में दे दिया और मैं तुम्हें विदा कर आया।
खैर, भगवान की मर्जी। मेरा-तुम्हारा साथ इतना ही था। तुम मुझसे पहले ऊपर चली गयी। अब वहां दुआ करना कि तुम्हारी ही तरह कोई फिर से आए। मेरे चेहरे पर असली रौनक तो तभी आएगी।

- तुम्हारा पापा शिवम्...

Wednesday, March 8, 2017

Funniest tweets by girls

http://m.huffingtonpost.in/2016/08/01/50-hilarious-tweets-by-indian-women-that-are-pure-gold/

Saturday, February 18, 2017

इच्छाधारी प्रेम

इच्छाधारी प्रेम .........

आकाश ने क्षितिज के पास पहुँच
हाथ बढ़ाया
धरती अपरिचय से कसमसाई
आकाश ने अस्फुट स्वर में कहा
मित्र !
मुस्कुरा कर
बढ़ा दिया था हाथ
धरती ने भी

आकाश की
सफ़ेद कमीज़ की
बायीं जेब से झांकता था
इच्छाधारी प्रेम

वह रोज कहता
प्रेम
धरती में सिर हिलाती नकार में

पूरनमासी के रोज
समुन्दर में ज्वार था
चंद्रमा धरती के बेहद करीब
स्निग्ध ज्योत्स्ना में
आकाश को भर आँख देख
धरती उसके कान में फुसफुसाई
प्रेम!

अपरिचय की गाँठ खुली
झक्क सफेद कमीज़ की
बायीं वाली जेब से
चितकबरे पंखों वाला
कबूतर
अपरिचय के अनंत आकाश की
उड़ान पर था ।

Tuesday, February 7, 2017

तेरे हाथों की लकीरों में,
मैं आ कर के बस जाता
तुम्हे, मुझसे मोहब्बत है
बता देतीं अगर पहले..
कशिश पाने की तुमको है
या ग़म खो देने का है फिर
ये सब मैं दफ्न कर देता
बता देतीं अगर पहले।

Happy roseDay Princess

I loved her, and sometimes she loved me too.
On nights like this, I held her in my arms.
I kissed her so many times under the infinite
sky.
She loved me, sometimes I loved her.
How could I not have loved her large, still
eyes?
I can write the saddest poem of all tonight.
To think I don't have her. To feel that I've
lost her.
To hear the immense night, more immense
without her.
And the poem falls to the soul as dew to
grass.
What does it matter that my love couldn't
keep her.
The night is full of stars and she is not with
me.
That's all. Far away, someone sings. Far
away.
My soul is lost without her.
As if to bring her near, my eyes search for
her.
My heart searches for her and she is not with
me.
The same night that whitens the same trees.
We, we who were, we are the same no longer.
I no longer love her, true, but how much I
loved her.
My voice searched the wind to touch her ear.
Someone else's. She will be someone else's. As
she once
belonged to my kisses.
Her voice, her light body. Her infinite eyes.
I no longer love her, true, but perhaps I love
her.
Love is so short and oblivion so long.
Because on nights like this I held her in my
arms,
my soul is lost without her.
Although this may be the last pain she causes
me,
and this may be the last poem I write for
her."