जब कोई इस सन्नाटे की खुनकी में भारी पड़ता है ,
जब किसी रोज इस मंदिर में , मदिरालय भारी पड़ता है
भाई कहते हैं बहुत हुआ , अब आगे गपल खायेगा
पी लेगा कितनी भी दारु , एक रोज बहुत पछताएगा ;
जब आधी रात बिछौने में आँखों ने समंदर खोले हैं ,
जब छुप कर ये रक्ताभ चक्षु , उसकी तस्वीर टटोले हैं ।
तब ताना लगता है जीवन , जीना गद्दारी लगता है ।
ये सम समाज मेरे दिल को , कुत्सित दुखियारी लगता है
तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है ,
और उस पगली लड़की के बिन , मरना भी भारी लगता है ।
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