Friday, March 31, 2017

डिअर प्लेसेंटा

माय डियर प्लेसेंटा,

तुम सोच रही होगी कि पापा ने ये कैसा नाम रखा मेरा। पर क्या करूं, जब से तुमने मम्मी के पेट में उलछ कूद शुरू की, तब से एक ही तो शब्द सुना मैंने- प्लेसेंटा। डॉक्टर बोली कि प्लेसेंटा खिसक गया है, नर्स बोली प्लेसेंटा नीचे आ गया। प्लेसेंटा को ये हो गया, प्लेसेंटा को वो हो गया। तब ही सोच लिया था कि जब तुम आओगी तुम्हें प्लेसेंटा कहकर ही पुकारूंगा।सोचा यह भी था कि तुम्हारे आने पर सिर्फ तुम ऊआं... ऊआं... करके रो रही होगीे और हम खुशी से फूले नहीं समाएंगे। लेकिन तुमने तो उलटी कहानी रच दी। तुम आने के बाद चुप रही और हमारी अांखों में आंसू थे।
मेरी हथेली से कुछ ही बड़ी थीं तुम, लेकिन पूरे जिस्म को हिला गयीं।

तुमने जमीन नहीं छुई। मां के पेट से सीधे ओटी की ट्रे में और फिर मेरे हाथों में थे। कुदरत का खेल तो देखो पाँच महीने में तुम पूरी हो चुकी थीं। भले ही बाकी लोगों ने तुम्हें सिर्फ देखा, लेकिन मैंने तुम्हें पढ़ा था। लग रहा था जैसे कहोगीे लो पापा मैं आ गयी। तुम्हारा बड़ा सा माथा, पतली अंगुलियां, लंबे पैर। कहीं-कहीं तुम्हारी स्कीन भी बन रही थी। वो छुटुक सा चेहरा भी देखा मैंने। मेरे जैसी ही दिखी।

तुम वक्त से काफी पहले आ गयीं, फिर भी ओटी के बाहर भीड़ लगी थी। सोचो अगर वक्त पर आती तो क्या आलम होता।

मालूम है तुम्हारी इस जल्दबाजी में मम्मी ने तो सुधबुध खो दी। नानी, मौसी, ताई जी पूरे वक्त रोती रहीं। पापा जैसे स्ट्रांग मैन को भी गुमसुम देखा मैंने। अपने जिन दोस्तों को बताया वह भी उदास थे। आधा बालिस जान दो परिवारों को रुला गई।

कुछ वक्त पहले तुम्हारी हार्ट बीट भी सुनी थी मैंने। एक नहीं तीन बार। जब डॉक्टर बोलता था कि बच्चे की सांसें नॉर्मल हैं तो एक्साइटमेंट में मेरी सांसें तेज चलने लगती थीं। कभी-कभी रात में भी तुम्हारी उथल पुथल का अहसास होता था।

तुम्हारी सलामती के लिए दवा और दुआ करने में कोई कसर नहीं रखी। न एक वक्त की टेबलेट, इंजेक्शन मिस किया और न दुआ। तुम्हें हाथ लगा-लगाकर तुम्हारी मां तुम्हें प्यार करती थी, मोबाइल पर आरती और गाने सुनाये जाते। फिर भी...तुम चली गयी।

तुम्हारे नखरे भी कुछ कम नहीं उठाए। जब से तुम आयीं तुम्हारी मां ने जो बोला वह किया। उसका बोला हर लफ्ज उसका नहीं तुम्हारा होता था। तुम उसे इशारा करती थी कि पापा से आज रसमलाई मंगवाओ। आज मुझे आइसक्रीम खानी है, आज मुझे पनीर चाहिए। जब मैंने तुम्हारा हरेक कहना माना तो तुम क्यों रूठ गयी जल्दी।

जिन पंडित जी को तुम्हारे आने की खुशी में पूजा करानी थी, कल उनसे ही पूछना पड़ा कि अब तुम्हें कैसे विदा करूं। एक सफेद कपड़े में लपेटकर नर्स ने तुम्हें मेरे हाथों में दे दिया और मैं तुम्हें विदा कर आया।
खैर, भगवान की मर्जी। मेरा-तुम्हारा साथ इतना ही था। तुम मुझसे पहले ऊपर चली गयी। अब वहां दुआ करना कि तुम्हारी ही तरह कोई फिर से आए। मेरे चेहरे पर असली रौनक तो तभी आएगी।

- तुम्हारा पापा शिवम्...

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