इच्छाधारी प्रेम .........
आकाश ने क्षितिज के पास पहुँच
हाथ बढ़ाया
धरती अपरिचय से कसमसाई
आकाश ने अस्फुट स्वर में कहा
मित्र !
मुस्कुरा कर
बढ़ा दिया था हाथ
धरती ने भी
आकाश की
सफ़ेद कमीज़ की
बायीं जेब से झांकता था
इच्छाधारी प्रेम
वह रोज कहता
प्रेम
धरती में सिर हिलाती नकार में
पूरनमासी के रोज
समुन्दर में ज्वार था
चंद्रमा धरती के बेहद करीब
स्निग्ध ज्योत्स्ना में
आकाश को भर आँख देख
धरती उसके कान में फुसफुसाई
प्रेम!
अपरिचय की गाँठ खुली
झक्क सफेद कमीज़ की
बायीं वाली जेब से
चितकबरे पंखों वाला
कबूतर
अपरिचय के अनंत आकाश की
उड़ान पर था ।
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