बमुश्किल रोक पाया था
मैं आंसू के उन दो कतरों को
गाल तक आते आते,
दो बातें ही बोली थी
मैंने धीरे से तुमसे
एक कि अब बस जाता हूँ मैं,
एक यहीं तुम रोक लो खुद को
रुंधा हुआ था गला तुम्हारा
और झुकी हुई थी गर्दन भी,
थके हुए थे हम दोनो
और थका हुआ था मौसम भी
एक कसक बस कसक रही थी
क्यों न मौसम से पहले
ये बारिश रुक रुक जाती और हम भीग न जाते आंसू से,
क्यूँ वक़्त सख्त था इतना कि वो रुका नहीं बस एक पल को
क्यूँ संग साथ न ले जा सके हम
अपनी आँखों के जल को
क्यूँ रुकी रहीं तुम मुझे ताकती,
कैब को एक्स्ट्रा भाड़ा देकर,
थमी रह गयी साँसें ये क्यों
उतरा चित्र तुम्हारा लेकर,
क्यूँ उहाफोह में फंसा हुआ मैं
तुमको बेबस छोड़ रहा हूँ
क्यूँ सकुचाती इन आँखों से
अश्क़ की लड़ियाँ तोड़ रहा हूँ..?
Sunday, August 27, 2017
First meet abroad
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