जो बन सके तेरी आवाज़ स्याही
और ढल सके तू कलम में कहीं
तो मैं शायर भी सही।
घेरती हैं भीड़ में आँखें सभी ख़ामोशी
को मेरी,
जो मिलें इनमे तुम्हारी भी नज़रें कभी
तो मैं तमाशा भी सही।
सुनते हैं अल्फ़ाज़ सभी इशारों से
अनजान होकर,
सच मानते हैं बातें मेरी गुमराह हो कर
के नशे में डूबी ये पंक्तियाँ
लिखी हैं मैंने होश में,
पर जो उतर जाओ मुझमें आज फिर
तुम ज़ेहर बन कर
तो सच पूछो तो मैं झूठा भी सही।
मेरे लब्जों की तस्वीर चढ़ती है आँखों
में ज़रा रुक कर,
घुलता है ऐहसास ज़रा थमकर
जो रंग भर दो इनमें तुम अपने
और खिल उठें ये शब्द मेरे
तो मैं धुन्दला भी सही।
जलता हूँ मैं हर लव्ज़ पर
हर्फ़-दर-हर्फ़ घटता हूँ मैं,
शायद, इसीलिए धुंए सी इन बातों में
भीनी सी खुशबु सी बहती हो तुम
बस एक बार जो किसी कविता में
बस जाओ तुम
तो मैं राख़ की ढेरी भी सही।।
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