Wednesday, November 16, 2016

मुमकिन है

तुम अपने सारे वादे , भूल जाओ मुमकिन है
कभी भी मेरी आँखों की तरफ न रुख घुमाओ, मुमकिन है
ये मुमकिन है के शायद तुम कभी न समझ पाओगे हमे
या फिर कभी हमको समझ के , बुद्बुदाओ मुमकिन है
कभी सर्द रातों की टीस में दबी ,
कभी बिछौने की लटकन में सहमी सी यादें
कभी छावन में फैला हुआ मकड़ी का वो जाला
कभी सावन में घिरती बाहों से गर्दन में वो माला
कभी बेबस तकी आँखों के कुछ अनकहे किस्से
कभी सूखा दही पूरी, के वो आधे से दो हिस्से
कभी मुमकिन है तुम समझोगे यादों के मेरी माने( मायने)
कभी मुमकिन है तुमको याद मेरी हर जुबां होगी।,
कभी कोई दिया जल उठेगा यूँ खुद की गर्मी से
कभी खुद भी सहेम जाओगे जब होंठों की नर्मी से
उसी एक वक़्त के पल्लू में सबकुछ मिल जाए मुमकिन है
💜

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