Wednesday, November 9, 2016

नवम्बर की शाम

ये शामें उकसाती हैं मुझको
तुमको प्यार जताने को

ये रातें याद कराती हैं
मन करता है दुलराने को

क्या कहूँ ये बेकल मन ही है
क्या करूँ मुझे कुछ ग़म ही है

क्या समझ नहीं तुमको प्रियतम
क्या सबसे कंजर हम ही हैं?

क्या कभी नहीं लगता तुमको
क्या कभी न ये एहसास हुआ ,

क्या कभी न तुमको याद आया
क्या कभी न मन यूँ उदास हुआ ,

क्या कभी नहीं इतराया ये दिल
फिर मेरी हो जाने को!

ये रात नवंबर की देखो
आधी जागी आधी सोई

ये आँखें यूँ इन यादों में
किसके स्वप्नों में खोई

क्यों मन में ये भूचाल सा है
क्यों मन ये फ़क़त बेहाल सा है

मानो रस रंजित देह अभृ
में कोई कहीं निहाल सा है

तेरी ही तेरी यादें हैं ,
तेरी ही तेरी बातें हैं
सब यादों में सब बातों में
एक उलझा हुआ सवाल सा है।

क्या तुम्हे नहीं लगता प्रियतम
तुम-मुझमे कहीं समायी हो

क्या तुम्हे नहीं लगता प्रियतम
तुम मेरी ही परछाई हो

हो कभी रंग-रंगित मल्हार
कभि ग़म की एक शहनाई हो

हो कभी कभी भोली भाली,
पर कभी-कभी हरजाई हो!

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